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Monday, 4 April 2016

आइये मिलिए – श्रीमान राजेश भावन जी से

(एक लर्न आउट ऑफ़ द बॉक्स शिक्षक राजस्थान से)

शिवरतन झालानी
(शिव राजस्थान में लर्न आउट ऑफ़ द  प्रोग्राम बॉक्स सँभालते हैं)

श्रीमान राजेश भावन एक युवा, कर्मठ, परिश्रमी एवं कार्यशील व्यक्तित्व के धनी है जिन्होंने अपने शिक्षक जीवन की शुरुआत सन 1989 में (जबकि राजेश जी स्वयं 10वीं कक्षा में पढ़ते थे) समाज के पिछड़े एवं आर्थिक रूप से कमजोर प्राथमिक स्तर के बालको के अध्यापन के साथ की थी जो आगे चलकर बच्चो की संख्या बढ़ने पर अपने आवासीय घर में ही आस – पड़ोस के बालको के लिए आंशिक सामग्री के रूप में जो कि उनके पास उपलब्ध थी, से अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया|

राजेश जी  की कक्षा की झलक !
बात उन दिनों की है जब मैंने क्षेत्रीय कार्यक्रम सहयोगी के रूप में लर्न आउट ऑफ़ दा बॉक्स प्रोग्राम से जुड़ा था और पहली बार उनसे मिलने उनके विद्यालय, एक्मे अकादमी गया, वे उस दिन भी हमेशा की तरह बच्चो को अध्यापन करवाने में व्यस्त थे। उस बैठक से पहले, मैंने प्रथम में अपने सहयोगियों से उनके बारे में सुना था। प्रारंभिक परिचय के बाद, राजेश जी ने अपने शिक्षण संस्थान एक्मे अकादमी की कहानी सुनाई।

राजेश भावन द्वारा संचालित एक्मे अकादमी के रूप में वास्तविक एवं आधुनिक शुरुआत सन 2007 में हुई l एक्मे का अर्थ ‘शिक्षा के द्वारा जीवन के उच्चतम शिखर पर पहुचना’ जीवन का वह उच्चतम शिखर जिसे शैक्षिक परिस्थितियों में निरंतर प्रयास द्वारा प्राप्त किया जाता है| इसी लक्ष्य को लेकर ही राजेश जी ने इस विद्यालय की नींव रखी जिसमें कि कम संसाधन होते हुए भी आर्थिक रूप से कमजोर बालको को शिक्षा दी जा सके और वे अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सके, इस विद्यालय की स्थापना जयपुर के चांदपोल बाज़ार में एक जीर्ण- शीर्ण हवेली से हुई जिसमे छोटी छोटी कोठरी के समान कमरे थे जिसमे बच्चो को पढाया जाता था और बुनयादी सुविधा के नाम पर इस विद्यालय में कुछ भी नहीं था इसकी शुरुआत प्रारम्भिक तौर पर मात्र 6 बालको से हुई जो आगे चलकर धीरे धीरे अगले तीन सालो में बढकर 88 हो गई और वर्तमान में 198 से अधिक है|

शुरुआत के दो साल तक राजेश जी स्वम् ही विद्यालय के प्रबंधक, अध्यापक और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे| सुबह विद्यालय आकर की सफाई करना , बच्चो के बैठने के लिए दरी बिछाना, पानी भरना, इत्यादि कार्य स्वम ही करते थे|

राजेश जी के अनुसार ‘जो बालक पढाई में कमजोर होते है और एक ही कक्षा में बार-बार फेल हो जाते है और उनका दाखिला किसी भी विद्यालय में नहीं होता है तो उन बच्चो की जिम्मेदारी हमारे द्वारा ली जाती है और इसमें सबसे पहले बच्चो का शैक्षिक स्तर जांचा जाता है और शैक्षिक स्तर के अनुसार उनका दाखिला विद्यालय में करते है और उन बच्चो के साथ मेहनत करके उन्हें योग्य बनाते है| हमारे यहाँ पर प्रत्येक कक्षा में सिमित बालक होने के कारण हर बालक पर टीचर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से ध्यान दिया जाता है|'

इस विद्यालय का समय सुबह 8:30 से दोपहर 4 बजे तक है जिसमे सभी बच्चो को पढाना, गृहकार्य देना-जाँच करना और याद करवाना होता है|

कक्षा-कक्ष कम होने के कारण एक ही कक्षा- कक्ष में दो से तीन कक्षाओ का सञ्चालन किया जाता है जिसमे एक कक्षा को पढ़ाने के बाद उसे गृहकार्य करने को दे दिया जाता है इसके बाद ऐसा ही दूसरी कक्षा के साथ और ऐसा ही तीसरी कक्षा के साथ होता है और इसके बाद एक एक करके तीनो ही कक्षाओ का गृहकार्य जाँच भी किया जाता है|
2013 में राजेश जी का पढाने का तरीका !
मैंने इस विद्यालय को कई बार विजिट किया प्रत्येक विजिट में मुझे राजेश जी से अभिप्रेरणा मिली एवं उन्हें देखने और सुनने का अवसर मिला l जब मैंने विद्यालय की व्यवहारिक गतिविधियों पर नजर डाली तो मैंने पाया कि श्रीमान राजेश जी एक अच्छे विद्यालय व्यस्थापक एवं श्रेष्टतम शिक्षक है| राजेश जी अन्य अध्यापको से अलग ही प्रतीत होते है ऐसा लगता है कि मानो की उन्होंने शिक्षण कला में महारत हासिल कर ली हो| उनकी शिक्षण शैली बालको में आनन्द भर देने वाली, रूचि पैदा करने वाली, पारस्परिक प्रतिस्पर्धा एवं आपसी समायोजन स्थापित करने वाली है| राजेश जी के द्वारा अपनी शिक्षण प्रक्रिया में व्यवहारिक गतिविधियों को खेलों, चित्रों, मॉडल, समूह चर्चा और प्रोत्साहन आदि के माध्यम से बालको का सर्वागीण विकास किया जाता है| और इनके द्वारा विज्ञान के अनेक प्रयोग किये जाते है एवं बालको को उन प्रयोगों से सम्बंधित समूह चर्चा के लिए प्रेरित करते है l इनके द्वारा बालको की विश्लेषण कौशल का विकास भूलभुलैया की कहानियो एवं पहेलियाँ की सहायता से करते है| दैनिक जीवन की गतिविधियों के उदाहरण इसके द्वारा बालको को पिकनिक एवं ऐतिहासिक स्थलों के भ्रमण द्वारा प्रदान किया जाता है|

राजेश जी ने प्रतिकूल शैक्षिक परिस्थितियों को भी अनुकूलित शैक्षिक परिस्थितियों में तब्दील किया है| उन्होंने विद्यालयी ढांचे को गठित किया एवं कुछ उतरदायी शिक्षको को विद्यालय का हिस्सा बनाया| इनके द्वारा कार्यालयी व्यस्तताओ के बावजूद नियमित रूप से प्रतिदिन शिक्षको हेतू मोजुदा संसाधनों के कुशल उपयोग हेतू एक बैठक का आयोजन किया जाता है जिसमे रोजाना की गतिविधियों के बारे में जानकारियां ली जाती है और आगे के प्लान पर चर्चा की जाती है|